जीपीएस कंपनी का बड़ा घोटाला आया सामने, आरा के साइबर थाने में मामला दर्ज

रिपोर्ट: तारकेश्वर प्रसाद
बिहार के भोजपुर जिले से साइबर अपराध से जुड़ा एक बड़ा और चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसे अब तक की सबसे बड़ी साइबर और तकनीकी गड़बड़ी के रूप में देखा जा रहा है। इस मामले में आरा साइबर थाना में औपचारिक रूप से प्राथमिकी दर्ज कराई गई है। आरोप है कि बिहार सरकार के खनन विभाग द्वारा सूचीबद्ध जीपीएस प्रदाता कंपनियों ने लघु खनिज ढुलाई में लगे ट्रकों में कम गुणवत्ता वाले जीपीएस डिवाइस लगाए, जिससे न सिर्फ तकनीकी विफलता हुई बल्कि इसके जरिए व्यापक स्तर पर अवैध वसूली और धनशोधन किया गया।
इस पूरे मामले का खुलासा अजय यादव, जिलाध्यक्ष भोजपुर, सह प्रदेश उपाध्यक्ष बिहार ट्रक ओनर्स एसोसिएशन एवं जिला प्रभारी AIMTC (नई दिल्ली) ने किया है। उन्होंने साइबर थाने को दिए गए लिखित आवेदन में गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि यह घोटाला जीपीएस डिवाइस प्रदाता कंपनियों, बालूघाट संचालकों और एनआईसी (नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर) के कुछ कर्मियों की आपराधिक साठगांठ का परिणाम है।
अजय यादव ने अपने आवेदन में बताया कि अवैध खनन और अवैध परिवहन पर रोक लगाने के उद्देश्य से खनन विभाग ने राज्य भर में लघु खनिज ढुलाई में प्रयुक्त सभी ट्रकों में जीपीएस डिवाइस लगाना अनिवार्य किया था। इसके लिए विभाग द्वारा कुछ निजी कंपनियों को सूचीबद्ध भी किया गया था। नियम यह तय किया गया था कि जब तक बालूघाट पर ट्रक का लाइव लोकेशन खनन पोर्टल पर नहीं दिखेगा, तब तक ऑनलाइन खनिज चालान जारी नहीं होगा।
आवेदन के अनुसार, सूचीबद्ध कंपनियों ने अधिक मुनाफा कमाने की नीयत से मानकों पर खरे न उतरने वाले घटिया गुणवत्ता के जीपीएस डिवाइस ट्रकों में लगा दिए। इन डिवाइसों की खराबी के कारण अधिकांश ट्रकों का लोकेशन बालूघाट पर पहुंचने के बावजूद खनन पोर्टल पर अपडेट नहीं होता, जिससे चालान कटना स्वतः रुक जाता है। इसी तकनीकी खामी को अवैध वसूली का माध्यम बना लिया गया।
आरोप है कि जीपीएस कंपनियों, बालूघाट कर्मियों और एनआईसी के कुछ कर्मियों के गठजोड़ से चालान जारी करवाने के नाम पर ट्रक चालकों से प्रति ट्रिप 100 से 500 रुपये तक की अवैध वसूली की जा रही है। चालकों को मजबूर किया जाता है कि वे पैसे दें, अन्यथा उनका चालान नहीं कटेगा और ट्रक खड़ा रहेगा।
अजय यादव ने यह भी स्पष्ट किया कि जीपीएस डिवाइस सीधे खनन पोर्टल से जुड़ा होता है और उस पोर्टल का आईडी और पासवर्ड केवल अधिकृत एजेंसियों, घाट संचालकों और एनआईसी कर्मियों के पास ही होता है। ट्रक मालिकों या चालकों को पोर्टल में किसी प्रकार का हस्तक्षेप करने का अधिकार ही नहीं है। इसके बावजूद पूरे मामले में ट्रक व्यवसायियों को दोषी ठहराने की तैयारी की जा रही है, जो पूरी तरह अनुचित है।
आवेदन में यह भी उल्लेख किया गया है कि खनन विभाग द्वारा लोडिंग के दौरान जीपीएस लोकेशन को कथित रूप से अवैध तरीके से अपडेट कराने के आरोप में सैकड़ों ट्रकों की सूची सार्वजनिक कर दी गई है और उनके मालिकों को नोटिस जारी करने की तैयारी चल रही है। जबकि इस पूरे प्रकरण में ट्रक व्यवसायियों की कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका नहीं है।
अजय यादव ने साइबर थाना से मांग की है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर जीपीएस डिवाइस प्रदाता कंपनियों, बालूघाट संचालकों और एनआईसी के दोषी कर्मियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में इस तरह के तकनीकी भ्रष्टाचार पर रोक लग सके। साथ ही निर्दोष ट्रक व्यवसायियों को किसी भी तरह की कानूनी या आर्थिक प्रताड़ना से बचाया जाए।
इस मामले के सामने आने के बाद जिले के ट्रक व्यवसायियों में भारी आक्रोश है और वे इसे संगठित साइबर-आर्थिक अपराध बता रहे हैं। अब सभी की नजरें साइबर पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं कि इस कथित करोड़ों के जीपीएस घोटाले में दोषियों तक कानून का शिकंजा कब और कैसे कसता है।





