आरा में मधु लिमये की 31वीं पुण्यतिथि श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई गई

संवाददाता: तारकेश्वर प्रसाद

बिहार के भोजपुर जिले के आरा में स्वतंत्रता संग्राम के महान योद्धा, प्रखर समाजवादी चिंतक और ईमानदार राजनीति के प्रतीक रहे मधु लिमये की 31वीं पुण्यतिथि श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई गई। इस अवसर पर आरा सदर अस्पताल परिसर स्थित गांधी धाम में आयोजित कार्यक्रम में उनके चित्र पर माल्यार्पण कर लोगों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

कार्यक्रम का आयोजन गांव-गरीब चेतना मंच के तत्वावधान में किया गया। इस दौरान मंच से वक्ताओं ने मधु लिमये के संघर्षपूर्ण जीवन, उनके सिद्धांतों और समाज के प्रति समर्पण को याद किया। गांव-गरीब चेतना मंच के संयोजक राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि मधु लिमये अपने सिद्धांतों के प्रति आजीवन अडिग रहे। उन्होंने सत्ता, संपत्ति और सुविधाओं से हमेशा दूरी बनाए रखी। उन्होंने बताया कि मधु लिमये अपने राजनीतिक जीवन में कुल 23 बार जेल गए और वर्ष 1962 तथा 1967 में दो बार लोकसभा सांसद भी बने, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने कभी पेंशन तक नहीं ली, जो आज की राजनीति में एक दुर्लभ उदाहरण है।

वक्ताओं ने बताया कि समाजवादी चिंतक मधु लिमये का जन्म 1 मई 1922 को महाराष्ट्र के पूना (अब पुणे) में हुआ था। उन्होंने पूना के प्रसिद्ध फर्ग्युसन कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई के दौरान ही वे समाजवादी विचारधारा से प्रभावित हुए और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के झंडे तले सक्रिय राजनीति में उतर आए। महज सत्रह वर्ष की उम्र में ही वे पार्टी की स्थानीय इकाई के मंत्री बन गए थे।

वर्ष 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों की नीतियों के खिलाफ समाजवादियों ने युद्ध विरोधी आंदोलन की अगुवाई की। इसी क्रम में जयप्रकाश नारायण, यूसुफ मेहरअली और डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे दिग्गज नेता पूना आए, जहां मधु लिमये का संपर्क इन महान समाजवादियों से हुआ। कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही, मात्र अठारह वर्ष की आयु में, उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी शुरू कर दी।

मधु लिमये ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि “यह विश्व युद्ध हमारा नहीं है। अंग्रेजों ने हमें जबरन इसमें झोंक दिया है। हम न एक पाई देंगे और न एक सिपाही।” युद्ध विरोधी भाषण देने के कारण अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें एक वर्ष की सश्रम कारावास की सजा सुनाई और ‘धूलिया’ जेल में बंद कर दिया।

इसके बाद 1942 में महात्मा गांधी द्वारा दिए गए “अंग्रेजों भारत छोड़ो” और “करो या मरो” के आह्वान पर वे फिर से आंदोलन में कूद पड़े। वर्ष 1943 में, मात्र इक्कीस वर्ष की आयु में, उन्हें ‘डिफेंस ऑफ इंडिया रूल’ के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। युद्ध की समाप्ति के बाद वर्ष 1945 में उनकी रिहाई हुई।

देश आजाद होने के बाद भी मधु लिमये का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। जब गोवा पुर्तगालियों के अधीन था, तब उन्होंने गोवा की आजादी के लिए भी आंदोलन किया। इस दौरान पुर्तगाली सैन्य शासन ने उन्हें गिरफ्तार कर 12 वर्ष की सजा सुनाई। मधु लिमये ने अपना पूरा युवावस्था काल देश की आजादी और जनसंघर्षों के लिए समर्पित कर दिया।

वक्ताओं ने कहा कि आजादी के बाद मधु लिमये ने अपना संपूर्ण जीवन भारत के गरीबों, मेहनतकशों, खेतिहर मजदूरों, दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया। वे जीवनभर सादगी, ईमानदारी और सिद्धांतों की राजनीति के प्रतीक बने रहे।

कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने कहा कि मधु लिमये जैसे नेताओं का जीवन आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणा है। उनके विचार और संघर्ष आज भी प्रासंगिक हैं और सामाजिक न्याय की लड़ाई को दिशा देते हैं। श्रद्धांजलि सभा के अंत में दो मिनट का मौन रखकर महान समाजवादी नेता को नमन किया गया।

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