दुष्कर्म मामले में ऐतिहासिक फैसला: गलत विवेचना करने वाले थाना प्रभारी पर FIR के आदेश

नाबालिग पीड़िता को सजा के साथ न्यायालय ने जांच प्रक्रिया में लापरवाही और आपराधिक कदाचार पर दिखाई सख्ती

Report By : संजय साहू 

चित्रकूट जिले से एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला न्यायिक फैसला सामने आया है। नाबालिग दुष्कर्म से जुड़े एक संवेदनशील मामले में अदालत ने न केवल आरोपी को कठोर सजा सुनाई, बल्कि पुलिस विवेचना की गंभीर खामियों पर भी सख्त टिप्पणी की है। विशेष न्यायाधीश रेनू मिश्रा ने स्पष्ट किया कि न्याय केवल दोष सिद्ध करने तक सीमित नहीं होता, बल्कि निष्पक्ष, ईमानदार और विधिसम्मत जांच भी उतनी ही आवश्यक है।

यह मामला रैपुरा थाना क्षेत्र का है। पांच अप्रैल 2020 को एक महिला ने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि अगरहुण्डा निवासी छोटू उर्फ तेजप्रताप गुप्ता ने उसकी मानसिक रूप से विक्षिप्त नाबालिग पुत्री के साथ दुष्कर्म किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने विवेचना शुरू की और बाद में आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया।

सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष पीड़िता का बयान, चिकित्सकीय साक्ष्य, एफएसएल रिपोर्ट और अन्य परिस्थितिजन्य प्रमाण पेश किए गए। न्यायालय ने सभी साक्ष्यों का गहन परीक्षण किया। तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप पूर्ण रूप से सिद्ध होते हैं।

इसके बाद विशेष न्यायाधीश रेनू मिश्रा ने आरोपी छोटू उर्फ तेजप्रताप गुप्ता को दोषी ठहराते हुए 25 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। साथ ही उस पर 50 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया। अदालत ने कहा कि इस तरह के जघन्य अपराधों में कठोर दंड समाज में स्पष्ट संदेश देने के लिए आवश्यक है।

हालांकि, फैसले का सबसे अहम पहलू पुलिस विवेचना को लेकर की गई सख्त टिप्पणी रही। न्यायालय ने तत्कालीन रैपुरा थाना प्रभारी एवं विवेचक रमेश चन्द्र की कार्यशैली पर गंभीर असंतोष जताया। अदालत ने माना कि विवेचना के दौरान गढ़े गए और मिथ्या साक्ष्यों का सहारा लिया गया, जिससे एक निर्दोष व्यक्ति को गंभीर अपराध में फंसाने का प्रयास किया गया।

यही नहीं, अदालत ने यह भी कहा कि वास्तविक अभियुक्त को प्रारंभ से ही जांच के दायरे से बाहर रखा गया। यह कृत्य न केवल लापरवाही है, बल्कि आपराधिक कदाचार की श्रेणी में आता है। न्यायालय के अनुसार, इस तरह की विवेचना न्यायिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत है।

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए विशेष न्यायाधीश ने आदेश दिया कि तत्कालीन विवेचक एवं प्रभारी निरीक्षक रमेश चन्द्र के विरुद्ध सुसंगत धाराओं में अभियोग पंजीकृत किया जाए और इसकी सूचना न्यायालय को दी जाए। अदालत ने स्पष्ट कहा कि जांच में की गई लापरवाही न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को गंभीर नुकसान पहुंचाती है।

इसके अलावा, न्यायालय ने यह भी माना कि इस मामले में पर्यवेक्षणीय अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। आदेश में तत्कालीन थाना प्रभारी धर्मराज यादव सहित संबंधित अधिकारियों के खिलाफ आवश्यक प्रशासनिक और विभागीय कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

अंत में, न्यायालय ने आदेश की एक प्रति अपर मुख्य सचिव गृह, उत्तर प्रदेश और पुलिस महानिदेशक को भेजने को कहा है, ताकि उच्च स्तर पर मामले की समीक्षा हो सके। यह फैसला पुलिस विवेचना में पारदर्शिता, जवाबदेही और ईमानदारी सुनिश्चित करने की दिशा में एक सख्त और ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।

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