बस्ती से सामने आया चौंकाने वाला पारिवारिक विवाद, न्याय और सामाजिक धारणा के बीच फंसी एक परिवार की पीड़ा

बस्ती : उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद से सामने आया एक कथित पारिवारिक प्रकरण (Family Dispute Case) इन दिनों समाज, न्याय व्यवस्था और सामाजिक धारणाओं (Social Perception) पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। यह मामला केवल पति-पत्नी के विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें बच्चों की सुरक्षा (Child Safety), पारिवारिक रिश्तों की जटिलता और न्याय की निष्पक्षता (Justice System) जैसे संवेदनशील मुद्दे गहराई से जुड़े हुए हैं। आमतौर पर घरेलू विवादों में समाज और व्यवस्था की एक तयशुदा धारणा होती है, लेकिन बस्ती का यह मामला उस सोच को चुनौती देता दिखाई देता है।
प्रकरण में सामने आए आरोपों के अनुसार, एक 14 वर्षीय बालक ने अपनी ही मां के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए कानून की शरण ली है। बालक का कथन है कि पिता के न रहने की स्थिति में उसकी मां कथित रूप से अन्य पुरुषों को घर बुलाती थी और जब उसने इस पर सवाल उठाया, तो उसे डराने-धमकाने और जान से मारने की कोशिश तक की गई। हालांकि ये सभी आरोप (Allegations) जांच का विषय हैं, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने बालक की मानसिक स्थिति (Mental Condition) और सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।
बताया जा रहा है कि पति-पत्नी का विवाह लगभग 18 वर्ष पूर्व हुआ था। पति का कहना है कि उसने परिवार को बचाने और पत्नी को आत्मनिर्भर (Self Dependent) बनाने के उद्देश्य से उसके लिए ब्यूटी पार्लर (Beauty Parlour) खुलवाया। उसका दावा है कि यह प्रयास परिवार को मजबूत करने के लिए किया गया था, लेकिन बाद में परिस्थितियां उसके विपरीत चली गईं। पति का आरोप है कि बीते वर्षों में पारिवारिक संबंध लगातार बिगड़ते चले गए और समाज ने भी इस पूरे मामले में चुप्पी साधे रखी।
कथित तौर पर पिछले पांच वर्षों से पत्नी अपनी मां के घर रह रही है, जहां उसके साथ 12 वर्षीय बेटी भी है। पति का कहना है कि उसने कई बार न्यायालय (Court) का रुख किया, लेकिन पत्नी की ओर से सहयोग नहीं मिला। वहीं दूसरी ओर, आरोप है कि पत्नी अपने मायके पक्ष और कुछ अन्य लोगों के साथ आकर पति के साथ मारपीट (Assault) करती रही। इन परिस्थितियों के चलते पति अपने 15 वर्षीय बेटे के साथ मौसी के घर शरण लेने को मजबूर हुआ, जो अपने आप में एक गंभीर सामाजिक विडंबना (Social Irony) को दर्शाता है।
मामले में यह भी आरोप लगाया गया है कि जिस मौसी के यहां पति और बेटा रह रहे थे, वहां दो बार जानलेवा हमला (Life Threatening Attack) कराया गया। बताया जाता है कि इस संबंध में प्राथमिकी (FIR) भी दर्ज कराई गई, लेकिन इसके बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई। इससे पीड़ित पक्ष में प्रशासनिक उदासीनता (Administrative Inaction) को लेकर गहरी नाराजगी देखी जा रही है।
सबसे संवेदनशील प्रश्न उस 12 वर्षीय बच्ची को लेकर है, जो फिलहाल मां के साथ रह रही है। पिता की चिंता है कि कहीं उसकी बेटी भी असुरक्षित परिस्थितियों में न फंस जाए। हालांकि कानून (Law) की प्रक्रिया और पारिवारिक मामलों की जटिलताएं उसे केवल आशंकाओं के साथ जीने पर मजबूर कर रही हैं। पीड़ित का कहना है कि उसने मर्यादा और कानून के दायरे में रहते हुए कई बार पुलिस (Police Administration) और जिला प्रशासन से मदद की गुहार लगाई है।
यह पूरा मामला किसी एक परिवार तक सीमित न होकर उस सामाजिक व्यवस्था पर सवाल उठाता है, जहां कई बार न्याय (Justice) तथ्यों से अधिक धारणा के आधार पर चलता दिखाई देता है। बच्चे तब तक सुरक्षित माने जाते हैं, जब तक मामला सार्वजनिक चर्चा का विषय नहीं बनता। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन और न्यायिक व्यवस्था इस प्रकरण को एक सामान्य “पारिवारिक मामला” मानकर नजरअंदाज करती है या बच्चों और कथित पीड़ितों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए निष्पक्ष जांच और आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करती है।





