संघर्ष से सफलता तक का सफर चित्रकूट के दो सगे भाइयों का CRPF में चयन, गांव में खुशी और मां की आंखों में गर्व के आंसू

Report By : संजय साहू चित्रकूट
चित्रकूट : कठिन परिस्थितियां, सीमित संसाधन और लगातार संघर्ष अगर किसी इंसान के हौसलों को तोड़ न पाएं, तो वही संघर्ष एक दिन सफलता की मजबूत नींव बन जाता है। चित्रकूट जनपद (Chitrakoot District) के रामनगर विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत पियरियामाफी (Piyariyamafi Village) से सामने आई यह कहानी न केवल दो युवाओं की सफलता की गाथा है, बल्कि उन तमाम परिवारों की उम्मीद का प्रतीक है, जो अभावों के बीच भी अपने बच्चों के सपनों को जिंदा रखते हैं। पियरियामाफी गांव के दो सगे भाई सत्यम ओझा और शिवम ओझा का केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF – Central Reserve Police Force) में चयन पूरे क्षेत्र के लिए गर्व और प्रेरणा का विषय बन गया है।
साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकलकर देश की आंतरिक सुरक्षा (Internal Security) का हिस्सा बनना किसी सपने से कम नहीं था। ओझा परिवार बीते लगभग पंद्रह वर्षों से छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव (Rajnandgaon) जिले के भड़कापारा क्षेत्र में रहकर जीवन यापन कर रहा है। सीमित आय, बढ़ती जिम्मेदारियां और संसाधनों की कमी के बावजूद परिवार ने कभी भी बच्चों की शिक्षा और सपनों के साथ समझौता नहीं किया। माता-पिता ने अपने सुख-सुविधाओं को पीछे रखकर बेटों को आगे बढ़ने का अवसर दिया।

सत्यम ओझा ने बीएससी और बीएड (B.Sc & B.Ed) की पढ़ाई पूरी की, जबकि छोटे भाई शिवम ओझा ने एम.कॉम (M.Com) की शिक्षा प्राप्त की। दोनों भाइयों की प्रारंभिक शिक्षा एक छोटे से मंदिर परिसर में संचालित विद्यालय (Local School) से शुरू हुई थी। वहां से शुरू हुआ यह सफर निरंतर मेहनत, आत्मविश्वास और अनुशासन के बल पर CRPF की वर्दी तक पहुंचा। दोनों भाइयों ने बताया कि प्रतियोगी परीक्षाओं (Competitive Exams) की तैयारी के दौरान उन्होंने सेल्फ स्टडी (Self Study), ऑनलाइन क्लासेज (Online Classes) और नियमित शारीरिक अभ्यास को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाया।
उन्होंने कहा कि सुबह की दौड़, फिजिकल फिटनेस (Physical Fitness) और मानसिक अनुशासन (Mental Discipline) ने उन्हें कठिन परीक्षाओं के लिए तैयार किया। असफलताओं के दौर भी आए, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। हर असफल प्रयास को सीख मानकर आगे बढ़ते रहे। इस पूरी यात्रा में परिवार और गुरुजनों का मार्गदर्शन उनके लिए सबसे बड़ा संबल रहा।
इस उपलब्धि का श्रेय देते हुए दोनों भाइयों ने अपने माता-पिता और शिक्षकों (Teachers & Mentors) का विशेष रूप से आभार व्यक्त किया। उनका कहना है कि यदि घर का माहौल सकारात्मक न होता और माता-पिता का विश्वास उनके साथ न होता, तो यह सफलता संभव नहीं थी। उन्होंने ग्रामीण युवाओं से अपील की कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत ईमानदार हो, तो सफलता अवश्य मिलती है।
मां गायत्री देवी बेटों की सफलता की बात करते हुए भावुक हो उठीं। आंखों में छलकते आंसू और चेहरे पर संतोष के भाव के साथ उन्होंने कहा कि परिवार ने कई कठिन दौर देखे हैं, लेकिन बच्चों के सपनों को टूटने नहीं दिया। उन्होंने कहा कि आज ऐसा लगता है कि वर्षों का संघर्ष और त्याग (Sacrifice) सार्थक हो गया। उनके लिए यह केवल नौकरी नहीं, बल्कि सम्मान और आत्मगौरव का क्षण है।
पिता सृष्टि नारायण ओझा ने बताया कि उनके घर में हमेशा अनुशासन (Discipline), सादा जीवन (Simple Living) और स्वस्थ दिनचर्या को महत्व दिया गया। सुबह की दौड़, समय पर पढ़ाई और पौष्टिक भोजन (Nutritious Food) को आदत बनाया गया, जिसने बेटों के आत्मबल को मजबूत किया। उन्होंने कहा कि यही संस्कार आज उनकी सबसे बड़ी पूंजी बनकर सामने आए हैं।
जैसे ही दोनों भाइयों के CRPF में चयन की खबर गांव पहुंची, पियरियामाफी और आसपास के क्षेत्रों में खुशी की लहर दौड़ गई। ग्रामीणों ने ओझा परिवार को बधाइयां दीं और मिठाइयां बांटी गईं। गांव के बुजुर्गों और युवाओं ने इस सफलता को ग्रामीण प्रतिभा (Rural Talent) की जीत बताया और कहा कि यह कहानी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बनेगी।
यह कहानी सिर्फ दो भाइयों की नहीं, बल्कि उस जज्बे की है जो कठिन हालात में भी हार नहीं मानता। चित्रकूट की इस मिट्टी से निकली यह प्रेरक गाथा आज हजारों युवाओं को यह संदेश दे रही है कि अगर इरादे मजबूत हों और मेहनत सच्ची हो, तो हालात भी रास्ता छोड़ देते हैं।





