गणतंत्र दिवस पर केंद्रीय जेल सतना से सात बंदियों की रिहाई, सुधरती ज़िंदगियों को मिला नया अवसर

Report By : संजय साहू चित्रकूट
सतना : 26 जनवरी का दिन, जब पूरा देश गणतंत्र दिवस (Republic Day) के अवसर पर लोकतंत्र और संविधान के मूल्यों का उत्सव मना रहा था, उसी दिन मध्य प्रदेश के केंद्रीय जेल सतना (Central Jail Satna) में एक भावनात्मक और ऐतिहासिक दृश्य देखने को मिला। वर्षों से ऊंची दीवारों और लोहे की सलाखों के बीच बंद सात बंदियों के लिए यह दिन नई शुरुआत लेकर आया, जब जेल के भारी भरकम फाटक खुले और उन्हें समाज की मुख्यधारा में लौटने का अवसर मिला। यह क्षण केवल शारीरिक रिहाई का नहीं था, बल्कि आत्मसम्मान, विश्वास और सुधार की भावना का प्रतीक बनकर सामने आया।
जेल प्रशासन के अनुसार, गणतंत्र दिवस के अवसर पर निर्धारित नियमों और मानकों (Legal Provisions) के तहत अच्छे आचरण और सुधारात्मक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाने वाले सात बंदियों को रिहा किया गया। इन बंदियों के चेहरों पर वर्षों की पीड़ा, पछतावे और उम्मीदों का मिला-जुला भाव साफ नजर आ रहा था। खुली हवा में सांस लेते समय उनकी आंखों में नमी और मन में भविष्य की जिम्मेदारियों का एहसास झलक रहा था।
रिहा हुए बंदियों में लाली डोहर का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। उन्होंने कारावास (Imprisonment) की अवधि को केवल सजा के रूप में नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और सुधार के अवसर के रूप में अपनाया। जेल के भीतर श्रम कार्य (Prison Labour) करते हुए उन्होंने लगभग 80 हजार रुपये का परिश्रमिक अर्जित किया। यह राशि केवल आर्थिक मदद नहीं थी, बल्कि इस बात का प्रमाण थी कि यदि अवसर और मार्गदर्शन मिले, तो व्यक्ति अपने जीवन को नई दिशा दे सकता है।
इस अवसर पर केंद्रीय जेल की अधीक्षक लीना कोष्ठा (Superintendent Leena Koshtha) ने रिहा हुए प्रत्येक बंदी को एक फलदार पौधा (Fruit Plant) भेंट किया। यह प्रतीकात्मक पहल उनके नए जीवन की शुरुआत और समाज के प्रति सकारात्मक योगदान का संदेश लेकर आई। पौधा हाथ में थामे बंदियों की आंखों में भावुकता साफ दिखाई दे रही थी, मानो वे अपने भविष्य को संजोकर रख रहे हों। अधीक्षक ने अपने संबोधन में कहा कि यह पौधा उनके नए जीवन का प्रतीक है और जैसे वे इसे सींचेंगे, वैसे ही उन्हें अपने चरित्र और आत्मसम्मान को भी सींचना होगा।
लीना कोष्ठा ने यह भी कहा कि समाज (Society) हर व्यक्ति को उसके अतीत से आंकता है, लेकिन वास्तविक पहचान उसके वर्तमान कर्मों से बनती है। उन्होंने रिहा हुए बंदियों से अपील की कि वे जेल में सीखे गए अनुशासन (Discipline), श्रम और आत्मसंयम को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं और समाज में एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में योगदान दें। उनके शब्दों ने उस क्षण को और भी संवेदनशील बना दिया, जब बंदियों को वर्षों बाद अपराधी नहीं, बल्कि इंसान के रूप में संबोधित किया गया।
जेल परिसर में मौजूद अधिकारी और कर्मचारी भी इस भावुक पल के साक्षी बने। वातावरण में कोई औपचारिक शोर या उत्सव नहीं था, बल्कि एक शांत विश्वास (Silent Trust) महसूस किया जा सकता था। रिहा हुए बंदियों ने जेल प्रशासन और सरकार का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि जेल में चल रहे सुधारात्मक कार्यक्रम (Correctional Programs) ने उन्हें आत्ममंथन और बदलाव का अवसर दिया। उन्होंने भरोसा जताया कि वे दोबारा गलत रास्ते पर नहीं जाएंगे और समाज में सम्मानजनक जीवन जीने का प्रयास करेंगे।
केंद्रीय जेल सतना में संचालित सुधारात्मक और पुनर्वास योजनाएं यह दर्शाती हैं कि आधुनिक जेल व्यवस्था केवल दंड (Punishment) तक सीमित नहीं है, बल्कि सुधार और पुनर्निर्माण (Reformation & Rehabilitation) की दिशा में भी कार्य कर रही है। गणतंत्र दिवस पर मिली यह रिहाई न केवल सात व्यक्तियों की आज़ादी थी, बल्कि समाज के लिए यह संदेश भी थी कि हर इंसान को सुधरने का अवसर मिलना चाहिए और विश्वास मिलने पर परिवर्तन संभव है।





