चित्रकूट में प्रभारी मंत्री मन्नू कोरी का विवादित बयान, पत्रकारों को दी नसीहत पर उठे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सवाल

Report By : संजय साहू चित्रकूट
चित्रकूट : उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जनपद में एक बार फिर सियासी बयानबाजी ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। चित्रकूट के प्रभारी मंत्री मनोहर लाल उर्फ मन्नू कोरी (Manohar Lal alias Mannu Kori) अपने एक ताजा बयान को लेकर चर्चा में हैं, जिसमें उन्होंने पत्रकारों को लेकर ऐसी टिप्पणी कर दी, जिसे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ (Fourth Pillar of Democracy) पर परोक्ष दबाव के रूप में देखा जा रहा है। मंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है, जब सरकार और मीडिया के रिश्तों को लेकर पहले से ही कई सवाल उठते रहे हैं।
चित्रकूट दौरे पर पहुंचे प्रभारी मंत्री ने पत्रकारों से संवाद (Media Interaction) के दौरान कहा कि यदि पत्रकार सही, निष्पक्ष और जिम्मेदार खबरें लिखें, तो समाज में जागरूकता बढ़ेगी और बच्चों व परिवारों के कल्याण (Social Welfare) की दिशा में सकारात्मक बदलाव संभव है। मंत्री ने मीडिया को समाज का आईना (Mirror of Society) बताते हुए उसकी भूमिका को रेखांकित किया, लेकिन उनके इस कथन को लेकर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं।
राजनीतिक और मीडिया जगत से जुड़े जानकारों का कहना है कि मंत्री का यह बयान सुनने में भले ही सामान्य लगे, लेकिन इसके निहितार्थ (Implications) कहीं गहरे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि क्या अब सत्ता यह तय करेगी कि पत्रकार क्या लिखें और कैसे लिखें। लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका सत्ता से सवाल पूछने की होती है, न कि सत्ता से निर्देश लेने की। ऐसे में मंत्री की नसीहत को पत्रकारिता की स्वतंत्रता (Press Freedom) पर अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब-जब मीडिया ने सरकार और सत्ता पक्ष की नीतियों या कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं, तब-तब इस तरह के बयान सामने आए हैं। यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि सरकार की नाकामियों (Government Failures) पर प्रकाशित हो रही खबरों से असहजता के चलते ऐसे बयान दिए जा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह बयान इस बात का संकेत हो सकता है कि सच दिखाने और लिखने वाले पत्रकार अब सत्ता को खटकने लगे हैं।
गौरतलब है कि प्रभारी मंत्री मन्नू कोरी का नाम पहले भी कई विवादित बयानों (Controversial Statements) और गैर-जरूरी टिप्पणियों को लेकर चर्चा में रहा है। ऐसे में पत्रकारों को लेकर दिया गया यह ताजा बयान आग में घी डालने का काम कर रहा है। विपक्षी दलों और स्वतंत्र पत्रकारों का कहना है कि मंत्री को अपनी संवैधानिक सीमाओं (Constitutional Limits) का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में मीडिया को दिशा देने का अधिकार सत्ता के पास नहीं होता।
इस बयान के बाद अब कई अहम सवाल खड़े हो गए हैं। क्या सत्ता में बैठे लोग ही अब पत्रकारिता का सर्टिफिकेट (Journalism Certificate) देंगे। क्या सच लिखने की कीमत अब नसीहतों, सवालों और दबाव के रूप में चुकानी पड़ेगी। और क्या आने वाले समय में इस तरह के बयान मीडिया की स्वतंत्रता को और सीमित करेंगे।
चित्रकूट की राजनीति में यह बयान महज एक टिप्पणी भर नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे लोकतंत्र की सीमाओं (Democratic Boundaries) को छूने वाला एक बड़ा सवाल बताया जा रहा है। आने वाले दिनों में इस बयान पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और तेज होने की संभावना है, साथ ही यह देखना भी अहम होगा कि सरकार और मंत्री इस पर क्या सफाई पेश करते हैं।





