चलो रे डोली उठाओ कहार आधुनिकता की आंधी में विलुप्त होती ‘डोली प्रथा’

Report By: तारकेश्वर प्रसाद

कभी गांव की पगडंडियों पर गूंजने वाला गीत— “चलो रे डोली उठाओ कहार…”—आज स्मृतियों तक सिमट कर रह गया है। शादी-ब्याह के अवसर पर शाही सवारी मानी जाने वाली डोली प्रथा आधुनिकता और शहरी संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के कारण धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में खोती जा रही है। भोजपुर जिले सहित आसपास के ग्रामीण इलाकों में अब यह परंपरा लगभग पूरी तरह विलुप्त हो चुकी है।

समय के साथ गांवों में भी शहरी संस्कृति का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। अंग्रेजी दौर से चली आ रही जीवनशैली और आधुनिक साधनों ने हमारे समाज को सुविधा तो दी, लेकिन इसके साथ ही गांव की खुशबू और देश की प्राचीन परंपराएं भी धीरे-धीरे ओझल होती चली गईं। इनमें किसी एक व्यक्ति की भूमिका नहीं, बल्कि सामूहिक रूप से समाज की बदलती सोच और प्राथमिकताओं ने लोक परंपराओं को पीछे धकेल दिया है।

एक समय था जब शादी हो और दुल्हन डोली में सवार न हो—यह कल्पना से परे था। डोली पर बैठकर दुल्हन का ससुराल जाना सामाजिक सम्मान, परंपरा और भावनाओं का प्रतीक माना जाता था। वहीं दूल्हे के लिए हाथी-घोड़े की सवारी या सजे-धजे रथ पर बारात निकलना बड़े घरानों की शान समझी जाती थी। लेकिन आज डोली और कहार की जगह लग्जरी गाड़ियां, बैंड-बाजा और आधुनिक साज-सज्जा ने ले ली है।

लोक परंपराएं बनती जा रही हैं इतिहास
शादी-विवाह में शहनाई की मधुर धुन को कभी अत्यंत शुभ माना जाता था। यह धुन माहौल को पवित्र और भावनात्मक बना देती थी, लेकिन अब शहनाई आम से खास अवसरों तक सीमित हो गई है। डीजे और तेज संगीत ने इसकी जगह ले ली है। इसी तरह, डोली पर बैठकर विदा होने की परंपरा भी पूरी तरह समाप्ति की कगार पर है। आज शादी-विवाह के मौसम में न तो कहीं डोली नजर आती है और न ही उसे कंधे पर उठाने वाले कहार।

नई पीढ़ी के अधिकांश युवाओं को डोली और पालकी के बारे में जानकारी भी नहीं है। उनके लिए यह सब किताबों, पुराने गीतों और बुजुर्गों की यादों तक सीमित होकर रह गया है।

महंगे वाहनों में हो रही है दुल्हन की विदाई
1980 के दशक तक का समय याद करें तो दूल्हा पालकी पर सवार होकर ससुराल जाता था और दुल्हन डोली में बैठकर अपने पिया के घर पहुंचती थी। मायके से ससुराल तक की यात्रा कई घंटों में पूरी होती थी। इस दौरान रास्ते भर लोकगीत, ढोल-नगाड़े और भावनाओं से भरा माहौल होता था। आज वही दूरी महज कुछ मिनटों में महंगी कारों और एसी वाहनों से तय हो जाती है।

डोली प्रथा के समाप्त होने के साथ-साथ इसे ढोने वाले कहार समुदाय के सामने भी रोजगार का संकट खड़ा हो गया है। कभी शादी-ब्याह के मौसम में जिनके कंधों पर डोलियां उठती थीं, आज वे लोग बेरोजगारी और उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं।

हालांकि आज भी कुछ परिवार पारंपरिक तरीके से अपनी बेटी की विदाई करना चाहते हैं, लेकिन हालात यह हैं कि न तो डोली आसानी से मिलती है और न ही उसे ढोने वाले लोग। खासकर विदाई के वक्त गाए जाने वाले पारंपरिक गीत, जिनमें बेटी की विदाई का दर्द और भावनाएं झलकती थीं, अब इतिहास के पन्नों में कैद होकर रह गई हैं।

बदलते दौर में सवालों के घेरे में परंपराएं
डोली प्रथा का लुप्त होना सिर्फ एक परंपरा का अंत नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान के क्षरण की कहानी भी कहता है। आधुनिकता जरूरी है, लेकिन इसके साथ अपनी लोक संस्कृति और परंपराओं को सहेजना भी उतना ही आवश्यक है। यदि आज इन्हें संरक्षित करने की कोशिश नहीं की गई, तो आने वाली पीढ़ियां इन्हें केवल कहानियों और तस्वीरों में ही देख पाएंगी।

आज न डोली दिखती है, न कहार… और न ही वह गीत—“चलो रे डोली उठाओ कहार…”—जो कभी हर गांव की फिजा में गूंजा करता था।

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