छह साल का वह बालक जिसने तानाशाह राजा को झुका दिया और 360 कैदियों को दिलाई नई ज़िंदगी

रिपोर्ट: तारकेश्वर प्रसाद | कर्मक्षेत्र टीवी 

भोजपुर: भारतीय समाज की लोकपरंपराओं में ऐसी अनेक कथाएं हैं, जो इतिहास की औपचारिक किताबों में भले ही दर्ज न हों, लेकिन पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों की स्मृति, आस्था और सांस्कृतिक चेतना में जीवित रहती हैं। ऐसी ही एक विलक्षण कथा है बुधु भगत की—दुसाध (पासवान) समाज द्वारा देवतुल्य माने जाने वाले उस बालक की, जिसने महज़ छह वर्ष की उम्र में मोरंग देश के तानाशाह राजा को चुनौती दी और 360 बंदी भगतों की जान बचाई।

यह कथा केवल एक चमत्कार की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर के सामाजिक अन्याय, सत्ता के दमन और आस्था की शक्ति का प्रतीक भी मानी जाती है।

मोरंग देश और तानाशाह राजा की पृष्ठभूमि
भोजपुर जिले के चौकीपुर गांव निवासी चंद्रमा पासवान (दुसाध) बताते हैं कि कई पीढ़ियों पहले मोरंग देश में राजा हिमपति का शासन था। उनके राज में प्रजा संपन्न मानी जाती थी, लेकिन राजा का स्वभाव अत्यंत कठोर और तानाशाही था।

लोकमान्यता के अनुसार, राजा के दरबार में राहु पूजा कराने का निर्णय लिया गया। राजा ने पूरे राज्य में यह घोषणा करवा दी कि जो भी भगत उनके यहां आकर विधिपूर्वक राहु पूजा संपन्न करेगा, उसे पुरस्कार मिलेगा, लेकिन पूजा में असफल होने पर कारागार की सज़ा दी जाएगी।

इस घोषणा के बाद कई भगत पूजा के लिए मोरंग पहुंचे, किंतु पूजा सफल न होने के कारण एक-एक कर 360 भगतों को जेल में डाल दिया गया। धीरे-धीरे यह पूजा भय का कारण बन गई और राज्य में आतंक का माहौल व्याप्त हो गया।

संकट के बीच जन्मी उम्मीद
जेल में बंद भगतों के परिजन और स्वयं कैदी भगवान से प्रार्थना करने लगे कि कोई ऐसा आए, जो राजा के इस अन्याय का अंत कर सके। इसी दौरान मोरंग  क्षेत्र में यह चर्चा फैलने लगी कि कुशुमहर गांव में एक छह साल का बालक है, जिस पर भगवान राहु की विशेष कृपा मानी जाती है।

इस बालक का नाम था  बुधु भगत
लोककथाओं के अनुसार, बाल्यावस्था में ही बुधु भगत में असाधारण आध्यात्मिक शक्ति देखी जाने लगी थी। दुसाध समाज में यह मान्यता प्रचलित हो गई कि बुधु भगत संकटमोचक हैं और विपत्ति में उनका स्मरण करने से रक्षा होती है।

कुशुमहर गांव पहुंचा नेवता
मोरंग देश के जयपत दुसाध स्वयं कुशुमहर गांव पहुंचे और बुधु भगत के परिवार के सामने अपनी पूरी व्यथा रखी। उन्होंने बताया कि अब तक 360 भगत जेल में बंद हो चुके हैं और उनकी जान खतरे में है।

परिवार के लिए यह फैसला आसान नहीं था। एक छह साल के बच्चे को तानाशाह राजा के दरबार में भेजना खतरे से खाली नहीं था। घर में भय और चिंता का माहौल बन गया।

हालांकि लोकश्रुति के अनुसार, बुधु भगत ने स्वयं नेवता उठाया और मोरंग जाने का निर्णय लिया। परिवार और गांव वालों की तमाम आशंकाओं के बावजूद वह अपने निर्णय पर अडिग रहे।


मोरंग पहुंचते ही डोल उठा राज्य
बताया जाता है कि बुधु भगत अपने साथियों के साथ मोरंग पहुंचे और गांव के सिवान पर पूजा मंडप स्थापित किया। जैसे ही मानर (पखावज) की गूंज चारों ओर फैली, पूरे क्षेत्र में हलचल मच गई।

मानर की आवाज इतनी प्रभावशाली थी कि उसकी सूचना राजा हिमपति तक पहुंची। राजा यह जानकर चकित रह गया कि उसके राज्य में कोई ऐसा आया है, जिसकी पूजा से पूरा इलाका गूंज उठा है।

अगली सुबह राजा स्वयं पूजा स्थल पर पहुंचा।

राजा और बालक आमने-सामने
जब राजा ने पूजा स्थल पर एक छोटे से बालक को देखा, तो वह आश्चर्यचकित रह गया। लोककथा के अनुसार, राजा ने बालक से उसका नाम और गांव पूछा। बालक ने निर्भीक होकर अपना परिचय दिया—बुधु भगत, ग्राम कुशुमहर।

राजा ने बालक की परीक्षा लेने का निश्चय किया।

अग्नि परीक्षा: सत्ता बनाम आस्था
लोकश्रुति के अनुसार, राजा के आदेश पर 21 फीट गहरा गड्ढा खुदवाया गया। उसमें आम की लकड़ियां और भारी मात्रा में घी डालकर प्रचंड अग्नि प्रज्वलित की गई।

राजा ने घोषणा की कि यदि बालक इस अग्नि से सुरक्षित बाहर निकल आता है, तभी उसकी पूजा को स्वीकार किया जाएगा।

पूरे गांव में सन्नाटा छा गया। लोग सहमे हुए थे। एक छह साल के बालक का आग में प्रवेश करना किसी के लिए भी कल्पनातीत था।

चमत्कार और आस्था की जीत
लोककथा कहती है कि बुधु भगत ने राहु भगवान का स्मरण किया और अग्नि में प्रवेश कर गए। कुछ समय बाद जब लोग अपनी आंखें खोलते हैं, तो बुधु भगत अग्नि से सुरक्षित बाहर निकलते दिखाई देते हैं।

इस दृश्य को देखकर राजा सहित पूरा क्षेत्र स्तब्ध रह गया। तभी “बुधु भगत की जय” के जयघोष गूंज उठे।

360 बंदियों की रिहाई
अग्नि परीक्षा से पहले ही बुधु भगत ने राजा से यह शर्त रखी थी कि यदि वह सफल हुए, तो कारागार में बंद सभी 360 भगतों को रिहा किया जाएगा और भविष्य में किसी भी भगत के साथ इस प्रकार का अन्याय नहीं होगा।

लोकमान्यता के अनुसार, राजा हिमपति का अहंकार टूट गया और उसने सभी बंदियों को रिहा करने का आदेश दे दिया।

आज भी जीवित है बुधु भगत की परंपरा
दुसाध समाज में आज भी यह विश्वास प्रचलित है कि बुधु भगत संकट में स्मरण करने पर रक्षा करते हैं। यही कारण है कि राहु पूजा की परंपरा आज भी इस समाज में श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।

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