धारकुंडी आश्रम के संस्थापक स्वामी सच्चिदानंद महाराज ब्रह्मलीन, शोक में डूबा चित्रकूट
102 वर्ष की आयु में महाराष्ट्र में देह त्याग, अंतिम दर्शन के लिए उमड़ रहा श्रद्धालुओं का सैलाब

Report By : संजय साहू, उपसम्पादक
चित्रकूट: धारकुंडी आश्रम के संस्थापक, महान संत एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शक स्वामी सच्चिदानंद महाराज (Swami Sachchidanand Maharaj) के ब्रह्मलीन होने का समाचार मिलते ही संपूर्ण चित्रकूट सहित देश-विदेश में फैले उनके श्रद्धालुओं में शोक की लहर दौड़ गई। 102 वर्ष की आयु में उन्होंने महाराष्ट्र में देह त्याग दिया। जैसे ही यह सूचना चित्रकूट पहुंची, आश्रमों, मंदिरों और साधकों के बीच गहरा शोक व्याप्त हो गया।
अंतिम दर्शन के लिए उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
स्वामी सच्चिदानंद महाराज का पार्थिव शरीर महाराष्ट्र से चित्रकूट लाया जा रहा है। जानकारी के अनुसार रविवार को धारकुंडी स्थित निर्माणाधीन आश्रम में उनका समाधि संस्कार (Samadhi Sanskar) संपन्न किया जाएगा। उनके अंतिम दर्शन के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से चित्रकूट पहुंच रहे हैं। आश्रम परिसर में श्रद्धा, भक्ति और शोक का वातावरण बना हुआ है।
तप, त्याग और साधना का आदर्श जीवन
स्वामी सच्चिदानंद महाराज का संपूर्ण जीवन तपस्या, वैराग्य और मानव सेवा का जीवंत उदाहरण रहा। उन्होंने मात्र 17 वर्ष की आयु में सांसारिक जीवन से विरक्ति लेकर साधना का मार्ग अपनाया। उनके गुरु परमहंस स्वामी परमानंद महाराज (Paramhans Swami Parmanand Maharaj) के सान्निध्य में उन्होंने कठोर तप कर आध्यात्मिक ऊँचाइयों को प्राप्त किया।
करीब 11 वर्षों तक वे विभिन्न तीर्थ स्थलों में भ्रमण करते रहे। इसके पश्चात चित्रकूट के समीप धारकुंडी में आश्रम की स्थापना की। यहीं से उन्होंने सनातन धर्म (Sanatan Dharma), साधना और सेवा का संदेश जन-जन तक पहुंचाया।
देश-विदेश में फैले शिष्य, 50 से अधिक आश्रम
स्वामी सच्चिदानंद महाराज के शिष्य भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी फैले हुए हैं। उनकी प्रेरणा से देशभर में लगभग 50 से अधिक आश्रम (Ashrams) संचालित हो रहे हैं। धारकुंडी आश्रम के साथ-साथ महाराष्ट्र के बदलापुर में भी उन्होंने एक भव्य आश्रम की स्थापना की थी, जो आज साधना और सेवा का प्रमुख केंद्र है।
संतों, समाजसेवियों और जनप्रतिनिधियों ने जताया शोक
उनके महाप्रयाण पर जिला पंचायत अध्यक्ष सत्यप्रकाश द्विवेदी (Satyaprakash Dwivedi), सांसद शंकर प्रसाद यादव (Shankar Prasad Yadav) सहित अनेक संत-महात्माओं, समाजसेवियों और विभिन्न संगठनों ने गहरा शोक व्यक्त किया। सभी ने इसे चित्रकूट और सनातन परंपरा के लिए अपूरणीय क्षति बताया।
निवृत्त और निर्लिप्त जीवन की अनुपम मिसाल
स्वामी सच्चिदानंद महाराज सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों से सदैव दूर रहे। सरल जीवन, उच्च विचार और निष्काम सेवा ही उनकी पहचान रही। आश्रम में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति उनके सहज, वात्सल्यपूर्ण और करुणामय व्यवहार से प्रभावित होता था।
स्वामी सच्चिदानंद महाराज का ब्रह्मलीन होना एक युग का अंत है, लेकिन उनके विचार, साधना और सेवा का प्रकाश सदैव उनके अनुयायियों और सनातन परंपरा को मार्गदर्शन देता रहेगा।





