मिड-डे मील बना मज़ाक पोषण योजना में पानी, पढ़ाई में लापरवाही, सोते रहे शिक्षक

Report By : संजय साहू, उपसम्पादक
महोबा : बेसिक शिक्षा विभाग की महत्वाकांक्षी मध्याह्न भोजन योजना एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। विकासखंड कबरई के प्राथमिक विद्यालय ढिकवाहा से सामने आए एक वायरल वीडियो ने न केवल स्कूल में व्याप्त गंभीर लापरवाहियों को उजागर किया है, बल्कि जिला प्रशासन की निगरानी व्यवस्था की वास्तविक स्थिति भी सामने रख दी है। मामला अब सीधे तौर पर बच्चों के पोषण, शिक्षा और जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है।
वायरल वीडियो में बच्चों के लिए तैयार किए जा रहे दूध की जो तस्वीर सामने आई, उसने अभिभावकों और ग्रामीणों को झकझोर कर रख दिया है। आरोप है कि एक तिहाई बाल्टी पानी में केवल दो छोटे दूध के पैकेट मिलाकर बच्चों में वितरण की तैयारी की जा रही थी। यह दृश्य साफ दर्शाता है कि मिड-डे मील योजना का मूल उद्देश्य बच्चों को पोषण उपलब्ध कराना कहीं न कहीं कागजी खानापूर्ति बनकर रह गया है। ग्रामीणों का कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है, बल्कि लंबे समय से बच्चों को इसी तरह पानी मिला दूध दिया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद योजना की जमीनी हकीकत इतनी शर्मनाक क्यों है।

वीडियो में सामने आया दूसरा पहलू और भी चिंताजनक है। जहां बच्चों को पढ़ाया जाना चाहिए था, वहां शिक्षक कुर्सियों पर झपकी लेते और जमीन पर बैठकर जम्हाई लेते दिखाई दे रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि कई शिक्षक नियमित रूप से देर से विद्यालय पहुंचते हैं और स्कूल समय में पढ़ाने के बजाय आराम फरमाते हैं। इससे न सिर्फ बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है, बल्कि उनका भविष्य भी अंधकार की ओर धकेला जा रहा है।
अभिभावकों और स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि विद्यालय में मिड-डे मील की गुणवत्ता लंबे समय से बेहद खराब है और शिक्षा व्यवस्था की हालत भी बदतर बनी हुई है। इस संबंध में कई बार शिकायतें की गईं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों ने अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। यही कारण है कि लापरवाही लगातार बढ़ती जा रही है और बच्चों के अधिकारों के साथ खुला खिलवाड़ हो रहा है।

मामला सामने आने के बाद शिक्षा विभाग में हलचल जरूर दिखाई दी, लेकिन अब तक केवल जांच का आश्वासन ही दिया गया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब छोटी-छोटी बातों पर त्वरित निलंबन की कार्रवाई हो जाती है, तो बच्चों के पोषण से जुड़े इतने गंभीर मामले में कार्रवाई क्यों धीमी नजर आ रही है। क्या प्रशासन ऐसे मामलों में सख्त कदम उठाने से बच रहा है, या फिर जिम्मेदारों को संरक्षण दिया जा रहा है—यह सवाल अब खुलकर उठने लगे हैं।
गौरतलब है कि यह कोई इकलौता मामला नहीं है। इससे पहले 20 दिसंबर को चित्रकूट के मानिकपुर क्षेत्र में भी 72 बच्चों को केवल चार लीटर दूध परोसे जाने का मामला सामने आया था, लेकिन दो महीने बीत जाने के बावजूद उस प्रकरण में भी कार्रवाई अधर में लटकी हुई है। लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि मिड-डे मील योजना की निगरानी व्यवस्था कमजोर पड़ चुकी है और जिम्मेदार तंत्र निष्क्रिय बना हुआ है।

ग्रामीणों और अभिभावकों ने जिला प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषी शिक्षकों के साथ-साथ जिम्मेदार अधिकारियों पर भी सख्त कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो बच्चों का पोषण और शिक्षा दोनों ही गंभीर संकट में पड़ जाएंगे।





