ईसा से 57 साल पहले हुआ एक महायुद्ध, फिर शुरू हुआ विक्रम संवत  जानिए हिंदू नववर्ष की कहानी

हर वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन हिंदू नववर्ष की शुरुआत होती है। यह दिन भारतीय संस्कृति और परंपराओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। विक्रम संवत की गणना इस दिन से शुरू होती है, जिसका इतिहास बेहद प्राचीन और गौरवशाली है। इस संवत का आरंभ एक महान सम्राट की विजय से जुड़ा हुआ है, जिसने भारत को गौरवान्वित किया। आइए जानते हैं हिंदू नववर्ष और विक्रम संवत की शुरुआत की पूरी कहानी।

विक्रम संवत का ऐतिहासिक महत्व: विक्रम संवत की शुरुआत ईसा से 57 वर्ष पूर्व मानी जाती है। यह संवत भारत के महान शासक सम्राट विक्रमादित्य की जीत के उपलक्ष्य में शुरू किया गया था। ऐतिहासिक कथाओं के अनुसार, सम्राट विक्रमादित्य ने उज्जयिनी (वर्तमान उज्जैन) में शासन किया और उन्होंने शक्तिशाली शकों को पराजित कर भारत की स्वतंत्रता को पुनः स्थापित किया। उनकी इस विजय की स्मृति में विक्रम संवत की गणना शुरू हुई।

सम्राट विक्रमादित्य और शकों पर विजय: शक जाति के लोग मध्य एशिया से आए थे और उन्होंने भारत के विभिन्न हिस्सों पर आक्रमण कर यहां अपना प्रभुत्व जमाना शुरू कर दिया था। इन आक्रमणकारियों से मुक्ति दिलाने के लिए सम्राट विक्रमादित्य ने एक विशाल युद्ध लड़ा। यह युद्ध भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण युद्धों में से एक था। इस युद्ध में उन्होंने शकों को पराजित कर उज्जैन को फिर से स्वतंत्र किया और भारतीय संस्कृति की रक्षा की। इस महायुद्ध के बाद ही विक्रम संवत की शुरुआत हुई।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का महत्व: हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष की शुरुआत मानी जाती है। इस दिन को भगवान ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की रचना का दिन भी कहा जाता है। इसके अलावा, यह दिन भगवान राम के राज्याभिषेक से भी जुड़ा हुआ माना जाता है। यही कारण है कि इसे अत्यंत पवित्र और शुभ माना जाता है। इस दिन से ही नवरात्रि की भी शुरुआत होती है, जिसमें मां दुर्गा की नौ दिनों तक पूजा-अर्चना की जाती है।

विक्रम संवत और भारतीय संस्कृति: विक्रम संवत न केवल एक कालगणना पद्धति है, बल्कि यह भारत की गौरवशाली संस्कृति और परंपरा का प्रतीक भी है। यह संवत भारतीय पंचांग की आधारशिला है और धार्मिक तथा सामाजिक आयोजनों में इसका विशेष महत्व होता है। हिंदू धर्म के सभी प्रमुख त्योहार, विवाह, गृह प्रवेश और अन्य शुभ कार्यों की तिथियों की गणना विक्रम संवत के आधार पर ही की जाती है।

नववर्ष का उत्सव और परंपराएं: हिंदू नववर्ष को देशभर में अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इसे ‘गुड़ी पड़वा’ के रूप में मनाया जाता है, तो कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में इसे ‘युगादी’ कहा जाता है। उत्तर भारत में इसे नव संवत्सर के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों को सजाते हैं, पूजा-पाठ करते हैं और नए संकल्प लेते हैं। कई स्थानों पर शोभा यात्राएं निकाली जाती हैं और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं।

विक्रम संवत भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह न केवल सम्राट विक्रमादित्य की वीरता को दर्शाता है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत की याद भी दिलाता है। हिंदू नववर्ष का यह शुभ दिन आत्मविश्लेषण और नए संकल्प लेने का भी अवसर होता है। हमें इस पावन दिन पर अपनी परंपराओं और मूल्यों को याद रखते हुए नए वर्ष का स्वागत करना चाहिए।

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