चित्रकूट महायज्ञ मंच से शंकराचार्य पर सीधा प्रहार, संत समाज के भीतर विवाद ने पकड़ी राजनीतिक धार
चित्रकूट के राजराजेश्वरी शिवशक्ति महायज्ञ मंच से शंकराचार्य पद को लेकर न्यायालय में लंबित विवाद पर दिया गया बयान चर्चा का विषय बन गया है। संत समाज के मतभेद और इसके संभावित राजनीतिक प्रभाव पर विस्तृत रिपोर्ट।

राम की तपोभूमि चित्रकूट की पावन धरती इन दिनों राजराजेश्वरी शिवशक्ति महायज्ञ के भव्य आयोजन की साक्षी बनी हुई है। वैदिक मंत्रोच्चार, यज्ञ की आहुतियां, संतों का प्रवचन और हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति के बीच यह आयोजन आध्यात्मिक वातावरण से परिपूर्ण था। लेकिन इसी मंच से दिए गए एक बयान ने पूरे आयोजन को अचानक राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया।
महायज्ञ के दौरान अधोक्षा जानन्द महाराज ने खुले मंच से ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि संबंधित व्यक्ति के शंकराचार्य पद को लेकर न्यायालयों में मामला विचाराधीन है और यह प्रकरण (Lower Court) से लेकर (High Court) और (Supreme Court) तक पहुंच चुका है। उनका यह बयान हजारों श्रद्धालुओं और संतों की मौजूदगी में दिया गया, जिसने संत समाज के भीतर चल रहे मतभेदों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बना दिया।

अधोक्षा जानन्द महाराज ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि यदि मुख्यमंत्री ने इस विषय पर कोई टिप्पणी की है तो उसमें उन्हें कोई त्रुटि नहीं दिखाई देती। इस कथन को कई विश्लेषक धार्मिक मंच से राजनीतिक संकेत के रूप में देख रहे हैं।
ज्ञात हो कि ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य पद को लेकर पिछले कुछ वर्षों से विवाद चल रहा है। अलग-अलग पक्ष अपनी-अपनी दावेदारी प्रस्तुत करते रहे हैं और मामला न्यायिक प्रक्रिया के दायरे में है। संत समाज का एक वर्ग इस विषय को परंपरा और सनातन मर्यादाओं से जुड़ा मानता है, जबकि दूसरा वर्ग न्यायालय के अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा को उचित ठहराता है।

धार्मिक मंच से दिया गया यह बयान अब केवल आध्यात्मिक या संस्थागत विवाद तक सीमित नहीं रह गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब किसी बड़े धार्मिक आयोजन से इस प्रकार की टिप्पणी सामने आती है, तो उसका प्रभाव व्यापक सामाजिक और राजनीतिक दायरे में महसूस किया जाता है। विशेषकर ऐसे समय में जब देश में चुनावी माहौल या वैचारिक बहस तेज हो, तब धर्म और राजनीति के अंतर्संबंधों को लेकर चर्चाएं और गहरी हो जाती हैं।
चित्रकूट जैसे ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के केंद्र से आया यह वक्तव्य कई सवाल भी खड़े करता है। क्या यह केवल संत समाज के भीतर का आंतरिक विवाद है, या फिर इसके व्यापक राजनीतिक निहितार्थ भी हैं? क्या धार्मिक मंच अब सामाजिक-राजनीतिक विमर्श के नए केंद्र बनते जा रहे हैं?

महायज्ञ स्थल पर धार्मिक अनुष्ठान यथावत जारी हैं। श्रद्धालु आस्था और भक्ति में लीन हैं, लेकिन संत समाज के भीतर उठी यह बहस आयोजन की चर्चा को एक अलग दिशा में ले गई है। कई संतों ने सार्वजनिक प्रतिक्रिया देने से परहेज किया है, जबकि कुछ ने इसे न्यायिक प्रक्रिया पर छोड़ने की बात कही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि शंकराचार्य जैसे उच्च आध्यात्मिक पद से जुड़ा कोई भी विवाद केवल धार्मिक दायरे तक सीमित नहीं रहता, क्योंकि इसका प्रभाव लाखों अनुयायियों की भावनाओं और व्यापक सामाजिक संरचना पर पड़ता है। ऐसे में सार्वजनिक मंच से दिए गए वक्तव्यों की संवेदनशीलता और जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है।
फिलहाल इस बयान के बाद संत समाज के विभिन्न गुटों के बीच संवाद और मतभेद दोनों की संभावना बढ़ गई है। आने वाले दिनों में संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया, न्यायालय की प्रक्रिया और राजनीतिक हलकों की प्रतिक्रिया इस प्रकरण की दिशा तय करेगी।
चित्रकूट की शांत और आध्यात्मिक फिजाओं में गूंजे इस बयान ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि समकालीन भारत में धर्म, न्याय और राजनीति के मुद्दे एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं हैं। जब धार्मिक मंच से राजनीतिक संदर्भ उभरते हैं, तो उसका प्रभाव दूरगामी हो सकता है।





