खाद्य मंत्रालय का चीनी मिलों को आदेश: जूट की बोरी में अनिवार्य 20% पैकेजिंग

नई दिल्ली: खाद्य मंत्रालय ने देश भर की सभी चीनी मिलों को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि चीनी के कुल उत्पादन का 20 प्रतिशत अनिवार्य रूप से जूट की बोरियों में पैक किया जाना चाहिए। यह निर्देश कपड़ा मंत्रालय द्वारा अधिसूचित जूट पैकेजिंग सामग्री अधिनियम, 1987 के तहत लागू किया गया है।
खाद्य मंत्रालय ने 27 मार्च को सभी चीनी मिलों के प्रमुखों को एक पत्र भेजकर इस नियम का पालन करने की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया है। इस पत्र में स्पष्ट किया गया है कि सरकार के निर्देशों का पालन न करने पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
क्या है आदेश?
खाद्य मंत्रालय के निर्देश के अनुसार, सभी चीनी निर्माताओं को अपने कुल उत्पादन का कम से कम 20 प्रतिशत जूट के थैलों या बोरियों में पैक करना अनिवार्य है। यह नियम इस उद्देश्य से लागू किया गया है ताकि जूट उद्योग को बढ़ावा मिले और पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों में योगदान दिया जा सके।
निर्देशों का पालन न करने पर कार्रवाई
अगर कोई चीनी मिल इस आदेश का पालन नहीं करती है, तो सरकार के पास कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार है। खाद्य मंत्रालय ने यह भी कहा है कि चालू चीनी सीजन (अक्टूबर 2024 – सितंबर 2025) के दौरान इस निर्देश का पालन न करने पर कड़ी सजा दी जाएगी।
मिलों की प्रतिक्रिया: कोर्ट का सहारा
इस अनिवार्य नियम के चलते कुछ चीनी मिलों और चीनी उद्योग के प्रतिनिधियों ने कानूनी कदम उठाए हैं। उन्होंने न्यायालय का रुख किया है, यह दावा करते हुए कि जूट की बोरियों में पैकिंग करने से चीनी की गुणवत्ता पर असर पड़ता है। उनका कहना है कि जूट में नमी को रोकने की क्षमता कम होती है, जिससे चीनी जल्दी खराब हो सकती है। इसके अलावा, उनके ग्राहक और थोक उपभोक्ता भी प्लास्टिक की बोरियों में पैक की गई चीनी को प्राथमिकता देते हैं।
जूट उत्पादन में गिरावट
इसी बीच, खरीफ फसल के दौरान कच्चे जूट (जूट और मेस्टा) का रकबा 2024 में 5.7 लाख हेक्टेयर रह गया, जो 2023 में 6.37 लाख हेक्टेयर था। इस गिरावट के कारण जूट का उत्पादन भी पिछले वर्ष के 96.92 लाख गांठों से घटकर 86.24 लाख गांठ (प्रत्येक गांठ का वजन 180 किलोग्राम) रह जाने का अनुमान है।
खाद्य मंत्रालय का यह आदेश न केवल चीनी मिलों के लिए चुनौती बन गया है, बल्कि जूट उद्योग के लिए भी एक महत्वपूर्ण मोड़ है। सरकार के इस फैसले के प्रभाव को लेकर उद्योग जगत और किसानों के बीच चर्चाएं तेज हो गई हैं। आगे देखना यह होगा कि कानूनी लड़ाई और उद्योग की प्रतिक्रिया के बाद सरकार इस आदेश में कोई बदलाव करती है या इसे पूरी तरह लागू करती है।