फरोग़-ए-उर्दू सेमिनार, कार्यशाला व मुशायरे का भव्य आयोजन

विशेष संवाददाता बिहार |कर्मक्षेत्र टीवी
सीवान: जिला उर्दू भाषा कोषांग, समाहरणालय सीवान के तत्वावधान में शुक्रवार, 31 जनवरी 2026 को टाउन हॉल, सीवान में फरोग़-ए-उर्दू सेमिनार, मुशायरा एवं कार्यशाला का भव्य आयोजन किया गया। इस सांस्कृतिक और साहित्यिक आयोजन में उर्दू भाषा, उसकी विरासत, शिक्षा और भविष्य पर गंभीर मंथन हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि जिला पदाधिकारी विवेक रंजन मैत्रेय एवं अन्य गणमान्य अतिथियों द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलन कर किया गया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जिला पदाधिकारी विवेक रंजन मैत्रेय ने उर्दू भाषा की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्ता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि उर्दू केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब और मिली-जुली संस्कृति की सशक्त पहचान है। उर्दू ने सदियों से विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों और सभ्यताओं को जोड़ने का कार्य किया है।
उन्होंने मशहूर शेर— “उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं दाग़, सारे जहाँ में धूम हमारी ज़बां की है”— का उल्लेख करते हुए कहा कि यह पंक्ति उर्दू की वैश्विक पहचान और उसकी साहित्यिक ऊंचाई को दर्शाती है।
जिला पदाधिकारी ने कहा कि उर्दू किसी एक धर्म, जाति या क्षेत्र की भाषा नहीं है, बल्कि इसमें संस्कृत, हिंदी, फारसी और अरबी सहित अनेक भाषाओं का सुंदर संगम देखने को मिलता है। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में उर्दू की भूमिका को याद करते हुए कहा कि “इंकलाब जिंदाबाद” जैसा ओजस्वी नारा उर्दू में ही दिया गया, जिसने देशवासियों में आज़ादी की लौ को और प्रखर किया।
उन्होंने बताया कि आज उर्दू दुनिया के 30 से अधिक देशों में बोली जाती है और यह विश्व की दस सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में शामिल है। भारत में जहां हिंदी को “मां” का दर्जा प्राप्त है, वहीं उर्दू को “मौसी” का सम्मान दिया गया है। बिहार में वर्ष 1981 में उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा मिला और राज्य सरकार इसके विकास व प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर प्रयासरत है।
इस अवसर पर जिला उर्दू नामा का विमोचन मुख्य अतिथि एवं अन्य अतिथियों द्वारा किया गया। इसके पश्चात आयोजित सेमिनार सत्र में “उर्दू जुबान का फरोग” विषय पर मरियम फातिमा, नाजिया परवीन, सफूरा सिद्दीकी, सूफिया सिद्दीकी एवं मुस्कान ने अपने विचार प्रस्तुत किए और उर्दू के संरक्षण व संवर्धन पर जोर दिया।
वहीं “मुश्तरफा की तहज़ीब और उर्दू जुबान” विषय पर डॉ. इम्तियाज सरमद साहब, डॉ. शमसुल आरफिन साहिबा एवं डॉ. ज़फरुल इस्लाम साहब ने सारगर्भित वक्तव्य दिए। वक्ताओं ने कहा कि उर्दू की तहज़ीब आपसी सौहार्द, प्रेम और इंसानियत का संदेश देती है, जो आज के दौर में और भी प्रासंगिक हो गई है।
“उर्दू की तदरीस, मसाइल और इमकानात” विषय पर डॉ. जफर कमाली साहब, डॉ. तारिक हसनैन साहब एवं डॉ. जैनब नाज साहिबा ने उर्दू शिक्षा से जुड़ी चुनौतियों, शिक्षकों की भूमिका और नई पीढ़ी में उर्दू के प्रति रुचि बढ़ाने की संभावनाओं पर विस्तृत चर्चा की।
कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में आयोजित मुशायरे ने पूरे माहौल को साहित्यिक रंग में रंग दिया। मुशायरे में कमर सिवानी, जफर कमाली, फैज अली फैज फैजी, जाहिद सिवानी, सोहैल पैगंबरपुरी, डॉ. नीलम श्रीवास्तव, मोइज बहमनबरवी, मुश्ताक सिवानी, बिपिन कुमार शरर एवं तृप्ति रक्षा ने अपनी उम्दा शायरी और रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। तालियों की गूंज और श्रोताओं की दाद ने मुशायरे को यादगार बना दिया।
संपूर्ण कार्यक्रम उपनिदेशक, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग उपेंद्र कुमार यादव की देखरेख में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। आयोजन ने न केवल उर्दू भाषा और साहित्य के प्रति लोगों की रुचि को प्रोत्साहित किया, बल्कि गंगा-जमुनी तहज़ीब के संदेश को भी मजबूती से आगे बढ़ाया।





