अवसाद, शोषण और उत्पीड़न के शिकार हैं निजी विश्वविद्यालयों के शिक्षक

डा. विजय श्रीवास्तव
नई शिक्षा नीति की घोषणा के बाद जिस तरह से उच्च शिक्षा संस्थान निजीकरण की ओर बढ़ रहे हैं, यह न केवल शिक्षा के उद्देश्य को विकृत कर रहा है, बल्कि शिक्षक वर्ग के जीवन में अवसाद, शोषण और उत्पीड़न का कारण बन रहा है। निजी विश्वविद्यालयों और ठेका संस्थानों की बढ़ती संख्या यह दर्शाती है कि शिक्षा अब एक व्यापार बन चुकी है, जहाँ बौद्धिक श्रम का न केवल शोषण हो रहा है, बल्कि उसे अमानवीय रूप से दोहन भी किया जा रहा है।
उच्च शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य विचार और नवाचार को बढ़ावा देना होना चाहिए था, लेकिन आज यह सिर्फ मुनाफा कमाने का एक साधन बन चुका है। निजी विश्वविद्यालयों में काम करने वाले शिक्षक शारीरिक और मानसिक रूप से तनावग्रस्त होते हैं, क्योंकि उन्हें लगातार ऑनलाइन कक्षाओं में बैठने के लिए मजबूर किया जाता है। इसके अलावा, काम के घंटों का कोई निर्धारित समय नहीं होता, जिससे उनकी व्यक्तिगत और भावनात्मक जीवनशैली भी प्रभावित होती है।
इसका असर न केवल शिक्षक के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है, बल्कि उनका शारीरिक स्वास्थ्य भी बिगड़ता है। वेतन और भत्तों में अनावश्यक कटौती, प्रशासनिक दबाव और अत्यधिक काम के घंटे शिक्षक के जीवन को तबाह कर रहे हैं। बौद्धिक परिचर्चाओं का स्थान अब केवल प्रशासनिक कार्यों के लिए अतिरिक्त दबाव बनाने में बदल चुका है। विभागाध्यक्षों का रवैया तानाशाहीपूर्ण हो चुका है, और वे शिक्षक को सिर्फ एक कार्यकर्ता समझते हैं, न कि एक बौद्धिक जीवित व्यक्ति।
इन संस्थानों के भीतर बौद्धिक श्रम का यह शोषण समाज की सृजनात्मकता की हत्या कर रहा है। अगर सरकार को बौद्धिक श्रमिकों के उत्पीड़न का संज्ञान लेना चाहिए, तो वह करती नहीं दिखती। एक लोकतांत्रिक समाज में ऐसी शोषणकारी प्रक्रियाएं समाज के विघटन का कारण बन रही हैं। ये शोषण और उत्पीड़न परिवारों के बीच अलगाव और मानसिक समस्याओं को जन्म दे रहे हैं। काम के घंटों का अनिश्चित होना जीवनशैली से संबंधित रोगों और अवांछित मृत्यु का कारण बन रहा है।
शिक्षकों के लिए शारीरिक व्यायाम करने का समय तक नहीं मिल पा रहा है, जिससे उनका शारीरिक स्वास्थ्य लगातार खराब हो रहा है। यह शोषण सांस्कृतिक रचनात्मकता की हत्या कर रहा है। आज के पूंजीवादी विश्वविद्यालय उन शिक्षकों से काम ले रहे हैं जो कभी सवाल नहीं उठाते, क्योंकि वे खुद बगावत नहीं कर सकते। इस प्रकार, विश्वविद्यालयों से निकली मशीनों से समाज और राष्ट्र निर्माण की आशा करना बेमानी सा लगता है।
यदि हम वर्तमान में देखें, तो भारत के निजी विश्वविद्यालयों का शोषण करने वाली व्यवस्था अब अधिक स्पष्ट हो गई है। शिक्षा क्षेत्र में बुरी तरह से फैली इस समस्या को रोकने के लिए, शिक्षक वर्ग को एकजुट होने की आवश्यकता है, लेकिन यह संभावना कम ही प्रतीत होती है। इस शोषण की स्थिति को समाप्त करने के लिए या तो सरकार को कार्रवाई करनी होगी, या फिर इन संस्थानों में काम करने वाले बौद्धिक श्रमिकों को एकजुट हो कर इस व्यवस्था का विरोध करना होगा।
हालिया आंकड़े बताते हैं कि 60% से अधिक निजी विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के वेतन में किसी न किसी प्रकार की कटौती की जा रही है। कई संस्थानों में तो यह स्थिति भी देखने को मिल रही है कि छात्रों के लिए निर्धारित पाठ्यक्रम का पालन नहीं किया जा रहा, और शिक्षकों को केवल प्रशासनिक कार्यों में लपेटा जा रहा है। इस कारण से न केवल शिक्षा की गुणवत्ता घट रही है, बल्कि एक पूरी पीढ़ी का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है।
क्या यह स्थिति भारत में ज्ञान आधारित शिक्षा प्रणाली के लिए शुभ संकेत है? नहीं, बल्कि इसके उलट, यह समाज को अंधकार की ओर धकेलने जैसा है। जब तक शिक्षकों के अधिकारों की रक्षा नहीं की जाती, तब तक यह समस्या जस की तस बनी रहेगी, और समाज को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।